आखिर कठिनाइयों का अन्त कैसे हो ................................



यदि आपको लगता है कि आपके जीवन में अत्यधिक कठिनाइयां हैं तो आप यह निश्चित समझ लें कि आप अभी तक अपने आप काे इतना पारंगत नहीं बना पाये हैं कि उस काम को सही ढंग से कर सकें। ऐसी परिस्थितियों में परेशान होने की बजाय अपनी कुशलता बढाने पर जोर देंगे तो निश्चय ही आपके रास्ते में आने वाली परेशानियां आपको रास्ते में पडने वाली उस नाली की तरह लगने लगेंगी जो आपको आगे जाने से रोकना तो चाहती हैं परन्तु आप इतनी सहजता उन्हें नजरअंदाज करते हुये आगे बढ जाते हैं कि आपको इसका पता भी नहीं चलता है। इसमें ऐसा नहीं है कि वे नालियां बेकार ही आपका रास्ता राेकने का प्रयाश करती है बल्कि वहीं नालिया जब आप छोटे थे तो आपकाे कई बार अपना रास्ता बदलने पर मजबूर भी कर चुकी हैं परन्तु जैसे जैसे आपने अपनी योग्यता को बढाया वे आपकी योग्यता आपकी कुशलता के आगे अपने आप ही छोटी होती चली गयीं। उसी तरह हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयां व परेशानियां हमें तब तक अपना रास्ता बदलने के लिए मजबूर करती रहेंगी जब तक हम अपनी योग्यता व कुशलता नहीं बढा लेते। जब हम अपनी कुशलता को बढा लेंगे तो वे कठिनाइयां इतनी छोटी होती चली जायेंगी कि आप उस पर ध्यान भी नहीं देंगे।  इसलिए हमें उन कठिनाइयों से उलझने से बेहतर है कि अपनी कुशलता को बढाना शुरू कर दें।

वेदमूर्ति युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा जी ने मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन जीने की कला बताते हुए कहा है कि अगर किसी को जीवन में महान बनना है तो उसके लिए उसे बडी से बड़ी कठिनाई का सामना भी करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। साथ ही महान बनने के बाद उस महानता को उसे हजम करने की कला भी आना चाहिए। क्योंकि जिसके जो व्यक्ति अपने आपको जितना महान समझता है उसके शत्रु भी उतने ही अधिक होते हैं। महानता का भाव एक प्रकार का मानसिक रोग है। जो व्यक्ति अपने आपको महान समझता है वह अंतर्मन से असन्तुष्ट रहता है। उसके मन में भारी अन्तर्द्वन्द्व होता रहता है। वह बड़े-बड़े काम का आयोजन करता है। उसके सभी काम असामान्य होते हैं। वह संसार को ही गलत मार्ग पर चलते हुए देखता है और उसके सुधार करने की धुन में लग जाता है।

  महानता के भाव से प्रेरित कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी (यानि कठिनाइयों) पर भौतिक विजय प्राप्त करने की चेष्टा करता है और कोई नैतिक। नैतिक विजय में वह अपने शत्रु को मित्र बनाने में भी समर्थ न होता परन्तु संसार में उसको पद पर से गिराने में समर्थ होता है। इस प्रकार जितने लोगों को वह नैतिक दृष्टि से संसार में नीचा सिद्ध करने की चेष्टा करता है, वे सब उसके शत्रु बन जाते हैं। इन शत्रुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है परन्तु शत्रुओं की संख्या बढ़ती हुई देखकर उसे कोई आश्चर्य नहीं होता। वह समझता है कि उसके उच्चादर्श का समाज द्वारा विरोध होना स्वाभाविक ही है ।


जब तक इन शत्रुओं से लड़ने को वह अपने आप में सामर्थ्य पाता है, वह कुछ न कुछ रचनात्मक काम में लगा रहता है । इस प्रकार वह संसार का कल्याण करने में समर्थ होता है । पर जब अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की उसकी आशा निराशा में बदल जाती है तो वह विक्षिप्त अथवा निराश पापी मनोवृत्ति का हो जाता है । इसलिए जीवन को बहुत ही संभल कर सावधानी पूर्वक जीना चाहिए जिससे आने वाली कठिनाइयों का अंत वह विवेक पूर्ण तरीके से कर सके ।


पंश्रीराम शर्मा 'आचार्य' के कुछ सुविचार आपके लिए प्रस्तुत हैं–


1- असफलता यह बताती है कि सफलता का प्रयाश पूरे मन से नहीं किया गया।


2-  प्रत्येक व्यक्ति जो आगे बढ़ने की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें यह मानकर चलना चाहिए परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर भेजते समय उसकी चेतना में समस्त संभावनाओं के बीज डाल दिये हैं ।


3-  असफलता यह बताती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया ।


4-  केवल वे ही असंभव कार्य को कर सकते हैं जो अदृष्य को भी देख लेते हैं ।


5-  मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप हैं । जो चाहे वह सब कुछ पा सकता हैं ।


6-  इस संसार में प्यार करने लायक़ दो वस्तुएँ हैं-एक दुख और दूसरा श्रम । दुख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता ।


7-  जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं- एक वे जो सोचते हैं पर करते नहीं, दूसरे जो करते हैं पर सोचते नहीं ।


8-  अवसर तो सभी को जिन्‍दगी में मिलते हैं, किंतु उनका सही वक्‍त पर सही तरीके से इस्‍तेमाल कुछ ही कर पाते हैं ।


9- बाज़ार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य अपना मूल्यांकन स्वयं करता है और वह अपना जितना मूल्यांकन करता है उससे अधिक सफलता उसे कदपित नहीं मिल पाती ।


10- आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है, पर निराशावादी प्रत्येक अवसर में कठिनाई ही खोजता है ।


11- सुख में गर्व न करें, दुःख में धैर्य न छोड़ें । बड़प्पन अमीरी में नहीं, ईमानदारी और सज्जनता में सन्निहित है ।


(साभार- स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज, वेदमूर्ति युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा, विश्व गायत्री परिवार व अन्य)

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