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नदी के द्वीप (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सायन) ...CSJMU BA-III (Hindi Literature)

  हम नदी के द्वीप हैं। हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए। वह हमें आकार देती है। हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं। माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं। व्याख्या -  कवि  का कथन है कि हम नदी के द्वीप हैं ,जिस प्रकार द्वीप का निर्माण नदी द्वारा होता है ,उसी प्रकार जीवन सरिता से हमारा निर्माण होता है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि नदी हमें छोड़कर चली जाए।    क्योंकि जो हम कुछ है हमारा कुछ अस्तित्व या आकार है ,वह सब नदी द्वारा प्रदत्त है। गलियाँ ,कोण ,अंतरीप ,उभार ,रेतीला तट ,गोलाई जो कुछ भी हममें परिलक्षित हो रहा है सब उसी के देन  है। इसी प्रकार नदी हमारी माता ,उसी ने हमें जन्म और यह आकाऱ दिया है। किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं। स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के। किंतु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है। हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं। पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जाएँगे। और फिर हम चूर्ण होकर भी कभी क्या धार बन सकते? रेत बनकर हम सलिल को तनिक गँदला ही करेंगे। अनुपयोगी ...

रजनीश ओशो (बहुमुखी दार्शनिक)

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                     ओशो किसी परिचय के मोहताज नहीं है। एक भारतीय संत ने अपने जमाने में इस कदर लोगों कद्र लोगों पर प्रभाव डाला कि पश्चिमी दुनिया की कई राजनैतिक शक्तियां इनके खिलाफ हो गई। किसी के लिए ओशो महान वक्ता, संत और आध्यात्मिक गुरु थे लेकिन कई लोग ओशो को केवल सनकी और सेक्स गुरु के तौर पर देखते थे। इन सबके बावजूद ओशो के विश्व भर में आज भी सैकेडों प्रशंसक और अनुयायी हैं।           रजनीश, आचार्य रजनीश या ओशो आप इन्हें किसी भी नाम से पुकार सकते हैं। ओशो की धारणा समय से आगे की थी और इसी वजह से उन्हें उस दौर में काफी विरोध झेलना पड़ा। जिस खुलेपन का उन्होंने समर्थन किया वह मनुष्य को संतुष्टि तक ले जाता था लेकिन लोगों की नजर में यह केवल वासना को बढ़ाने का एक जरिया लगा।           ओशो ने विश्व को धर्म, समाज और दर्शन को देखने और समझने का एक नया तरीका दिया। महाराष्ट्र के पूना में उन्होंने अपना आश्रम बनाया जो उस समय काफी प्रसिद्ध हुआ। लाखों सैलानी यहां हर वर्ष आने लगे और फि...

हाय निराशा कैसे जाये ............??

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आज हम लोग हमारे जीवन में निहित निराशाओं के बारे में बात करतें हैं कि कैसे हम अपने जीवन में निराशाओं‚ हताशाओं और परेशानियों से घिरे हुये हैं। सही मायने में देखा जाये तो हम लोग स्वयं ही अपने जीवन में निहित परेशानियाें के लिए जिम्मेदार है क्योंकि हम उनसे निपटने के लिए कोई न कोई अस्थायी हल ढूढने में लगे रहते है बजाय अपने आप को इतना कुशल व सक्षम बनाने के कि ऐसी परेशानियां हमको नजर ही न आयें। यदि हम अपने आप को तराशते हुये अपनी कुशलता को बढाना शुरू कर दें तो निश्चय ही हमे निराशा इतनी छोटी लगने लगेगी कि हम उसे बडी सहजता से नजरअंदाज कर सकते हैं।  मनुष्य भले ही अपने जीवन में कितना ही परेशान क्यों ना हो, उसके जीवन में कितना ही दर्द क्यों ना हो‚ कितनी ही निराशायें‚ परेशानियां या कठिनाइया क्यों न हों... आध्यात्मिक रूप से वह उड़ने के लिए ही बना है। नेपोलियन ने कहा था “जब तक आप अपने पंख नहीं फैलाओगे, तब तक आप यह नहीं जान पाओगे कि आप कितना ऊंचा उड़ सकते हो।"   जब हम अपने जीवन में तूफानों का सामना करते हैं, उस समय हमें सिर्फ और सिर्फ अपने पंख़ों को फैलाने की जरूरत होती है। कभी-कभार जीवन हमार...

आखिर कठिनाइयों का अन्त कैसे हो ................................

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यदि आपको लगता है कि आपके जीवन में अत्यधिक कठिनाइयां हैं तो आप यह निश्चित समझ लें कि आप अभी तक अपने आप काे इतना पारंगत नहीं बना पाये हैं कि उस काम को सही ढंग से कर सकें। ऐसी परिस्थितियों में परेशान होने की बजाय अपनी कुशलता बढाने पर जोर देंगे तो निश्चय ही आपके रास्ते में आने वाली परेशानियां आपको रास्ते में पडने वाली उस नाली की तरह लगने लगेंगी जो आपको आगे जाने से रोकना तो चाहती हैं परन्तु आप इतनी सहजता उन्हें नजरअंदाज करते हुये आगे बढ जाते हैं कि आपको इसका पता भी नहीं चलता है। इसमें ऐसा नहीं है कि वे नालियां बेकार ही आपका रास्ता राेकने का प्रयाश करती है बल्कि वहीं नालिया जब आप छोटे थे तो आपकाे कई बार अपना रास्ता बदलने पर मजबूर भी कर चुकी हैं परन्तु जैसे जैसे आपने अपनी योग्यता को बढाया वे आपकी योग्यता आपकी कुशलता के आगे अपने आप ही छोटी होती चली गयीं। उसी तरह हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयां व परेशानियां हमें तब तक अपना रास्ता बदलने के लिए मजबूर करती रहेंगी जब तक हम अपनी योग्यता व कुशलता नहीं बढा लेते। जब हम अपनी कुशलता को बढा लेंगे तो वे कठिनाइयां इतनी छोटी होती चली जायेंगी कि आप उस पर ध्...

स्वागत लेख........

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 नमस्कार दोस्तों।। आप सभी का इस पेज पर स्वागत है। आजकल सारा का सारा जमाना ही मोबाइल और इंटरनेट पर शिफ्ट हो गया है। छात्र चाहे किसी भी क्लास के हो या किसी फाउंडेशन कोर्स की तैयारी कर रहे हो, डिप्लोमा कोर्स कर रहे हो,  सर्टिफिकेट कोर्स की तैयारी कर रहे हों या फिर कम्पटीशन की तैयारी में जुटे हैं, लगभग सभी ने आज इंटरनेट का इस्तेमाल अपनी पढ़ाई के लिए शुरू कर दिया है और सही माने तो इसमें छात्रों को ज्यादा सुविधा, बहुत से टीचर्स से पड़ने का मौका, अपनी मनमानी विषय या टॉपिक को पढ़ने का मौका कम खर्चे और समय की बचत के साथ उपलब्ध हो जाता है। शायद यही कारण है कि छात्र इंटरनेट की तरफ ज्यादा तेजी से मुड़े है। पढने का मतलब केवल छात्रों तक ही सीमित नहीं होता बल्कि पढना तो सतत् सीखने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है जिसे हर आयु वर्ग का व्यक्ति फॉलो करता है किसी को लेख पढना पसन्द है‚ किसी को कहानियां‚ किसी काे कवितायें तो कोई महापुरूषों की जीवनियां पढता है‚ कोई धार्मिक कहानियां पढना पसन्द करता है‚ जो लोग बिजनेस करते हैं तो वह लोग अपने धन्धे को बढाने वाले तथ्य पढना और समझना पसन्द करते हैं। पढने से हम अपन...