नदी के द्वीप (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सायन) ...CSJMU BA-III (Hindi Literature)
हम नदी के द्वीप हैं। हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए। वह हमें आकार देती है। हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं। माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं। व्याख्या - कवि का कथन है कि हम नदी के द्वीप हैं ,जिस प्रकार द्वीप का निर्माण नदी द्वारा होता है ,उसी प्रकार जीवन सरिता से हमारा निर्माण होता है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि नदी हमें छोड़कर चली जाए। क्योंकि जो हम कुछ है हमारा कुछ अस्तित्व या आकार है ,वह सब नदी द्वारा प्रदत्त है। गलियाँ ,कोण ,अंतरीप ,उभार ,रेतीला तट ,गोलाई जो कुछ भी हममें परिलक्षित हो रहा है सब उसी के देन है। इसी प्रकार नदी हमारी माता ,उसी ने हमें जन्म और यह आकाऱ दिया है। किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं। स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के। किंतु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है। हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं। पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जाएँगे। और फिर हम चूर्ण होकर भी कभी क्या धार बन सकते? रेत बनकर हम सलिल को तनिक गँदला ही करेंगे। अनुपयोगी ...